Sunday, September 1, 2013

मैं परिवर्तन का अधिनायक हूँ


क्या राम प्रतीक्षा करता अपने बंधु-बांधव की?
क्या राम साधना करता देंवो की, प्रतिमाओ की?
क्या राम ठहर जाता तूफ़ानो में, मझाधारों में,
क्या राम सहन करता नित नए अरिदल के आघातो को?
क्या राम समझ लेता कोशिश मेरे वश में इतनी थी,
क्या राम मान लेता उसके भुजदंडो की क्षमता बस इतनी थी?
क्या राम समर्पण करता नियती के आलेखो को?
क्या राम निम्नतर कहता भाग्य से प्रयत्नों को?

नहीं, कदाचित्  नहीं
राम पुरुषार्थ का पूर्ण प्रदर्शन है,
राम जीवन की गति का उद्बोधन है। 
राम नहीं ठहरता तूफ़ानो में मझाधारों में,
वह तिनका भी हो तो लड़ता उसके प्रचंड आघातो से
राम समझ ना लेता की नियती का यह लेखा है। 
वह भाग्य कालेख बदल देता अपने कोदंड और बाणों से॥  



और यदि हाँ,
तो अब लक्ष्मण हमको बनाना है,
इन झंझावातो में निर्भीक हो लड़ना है
रहना है उद्वेलित क्यूंकि संयम का समय नहीं
है कर्म हमारे कर में, अब कर्म की रेखा को बदलना है॥  

है ज्ञान मुझे सिद्धांतो का नीति से उधृत भाष्यों का,
है सम्मान मुझे  गीता का, गीता के आदर्शो का। 

पर अब मेरी उत्कंठा मुझे उनसे पदच्युत करती है,
मुझे लक्ष्य को पाने को सदा उद्वेलित रखती है। 
अब प्रयासो के लिए नहीं परिणामों के लिए मैं चिंतित हूँ,
अब आशाओ से नहीं निष्कर्षो से में बंधित हूँ,
अब में उद्बोधन का नहीं उत्थानों का परिचायक हूँ। 
मैं दिव्यज्योति का नहीं उस विराट का दर्शन हूँ॥ 

है ये बाल मन की कोरी आकांक्षा ये उसका भोलापन है,
ये अल्प ज्ञान का निष्कर्ष ये कम समाज का चित्रण है। 
आवश्कता है सहज सुदृढ़ प्रयासों की,
शने शने परिस्थिति के अनुकूलन की। 
क्या हम उसमें सक्षम हो ये चिंतन भी आवशक है?
मुझे विश्वास है तुम और तुम्हारे प्रयासो पर
क्योंकि मैं इस उत्कंठा से अभिमंत्रित हूँ.
क्षमाप्रार्थी हूँ सहयोग तुम्हारा ना दे पाउँगा। 
अपने मन की इस श्लागा को अब में समेट ना पाउँगा॥ 

अब मैं अपने अश्वो को बंध मुक्त कर देता हूँ। 
मैं गीत नहीं बन सकता, मैं उद्घोष बनने निकला हूँ। 
मैं हस्त लगाव नहीं दिखा पाउँगा, एक प्रहार ही कर देता हूँ। 
मैं संयमित ज्ञानी नहीं, मैं उद्वेलित अज्ञानी हूँ। 
मैं जीवन का मधुर राग नहीं, में कर्कश कोलाहल हूँ। 
मैं अनुकूलन का नहीं, परिवर्तन का अधिनायक हूँ॥


Saturday, August 31, 2013

जीवन

जीवन इतना बुरा नहीं है पगले, जितना तूने मान लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का, चादर खुद पर तान लिया है ||

हर बाधा से डरता आया, डरता-डरता लड़ता आया |
पग-पग पर तू ठोकर खाता, गिरता संभलता फिर गिर जाता ||
लेकिन पथ को जैसा मान रहा है पगले, क्या पूरा तूने जान लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का,  चादर खुद पर तान लिया है ||
जीवन इतना बुरा नहीं है पगले|

खुशियों की चाह में तूने, कोरे भ्रम को गले लगाया |
फिर उसके परिचित आघातों से, क्यों तू बचता भाग रहा है ||
घाव इतना गहरा नहीं है पगले, जितना तूने मान लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का,  चादर खुद पर तान लिया है ||
जीवन इतना बुरा नहीं है पगले

इस संसार से प्रीत लगाईं, प्रीत लगाईं रीत निभाई |
फिर संसार की रीत के आगे, क्यों खुद को ही हार रहा है ||
मोह-माया छोड़ रे पगले, खुद से वैर ही पाल लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का,  चादर खुद पर तान लिया है ||

जीवन इतना बुरा नहीं है पगले…।

साधो रे मन को साधो रे


जीवन भर का सौदा रे
पथ पढ़े, पढ़ कर के सीखे
मैदान ना उतना आसां रे
खेले जीते बहुत बचपन से
अब हारन की आदत डालो रे
साधो रे मन को साधो रे

नाव फंसी तेरी बिच धार में
झटपट हाथ चलाना रे
धीरे जो तू जतन करे तो
संग प्रवाह बह जाना रे
उलटी धरा नौका खेनी
मन पतवार अब धारो रे

बेल चढ़े रस्सी के सहारे
कुसुमलता मुस्काना रे
जो रस्सी का संग हे छुटा
टूट धरा मिल जाना रे
साथी कब तक थाम सकेगा
आप ही जड़े जमाओ रे                                      
साधो रे मन को साधो रे

मन मकड़ी सैम झाल बिछाए
तुझे ही उस में फांसा रे
रहे सदा बहलाता तुझको
लघु स्वप्न उलझाना रे
मकड़ी ही खुद ना फंसे झाल में
उस जस पग पग धारो रे
साधो रे मन को साधो रे

कहे संत संतोष सुख साधन
अर्थ अनर्थ कर जाना रे
वे संतोष फल मांहि पाए
मन तेरो कर्म से पाना रे
करम संतोष कंहा मेरे बन्धु
प्रतिक्षण अछय प्रयासा रे
साधो रे मन को साधो रे  


जनक



मंद मग्न दृढनिश्चयी क्लांत, चढ़ रहा क्षितिज रवि रश्मिकांत। 
अविरल अनथक निष्काम कर्मठ, सम्पूर्ण जीवन पूर्ण अर्पण॥ 
प्रखर प्रबल प्रबुद्ध प्रकाश, उषा संध्या अनवरत प्रयास। 
सुख शांतिदायक दिप्तिपुन्ज, अक्षय उर्जा संचरण॥ 
सत्य साधक शुध्ह चिन्तक, रक्षक संरक्षक मार्गदर्शक।  
परहित समर्पित सदैव तत्पर, हे ! सूर्य रूप जनक प्रणाम॥ 

स्थितप्रज्ञ स्थिरचित्त, चेतन निरंतर निश्चिन्त शांत।   
शांत शुद्ध पवित्र सात्विक, सत्य समर्पित आचरण॥ 
कृष्ण शुक्ल समभाव से, अकर्ता कर्म शुद्ध चित्रण। 
आश्रय आनंद स्नेह सहस सकल सरस स्त्रवन॥ 
व्योम मंडित तामस खंडन, नक्षत्र नय नभपति विशाल। 

रजनी प्रहार पथ प्रदर्शक, हे ! चन्द्र रूप पिता प्रणाम॥ 

स्वधर्म एवं स्वभाव

जीवन के किसी ना किसी पड़ाव पर यह प्रश्न अवश्य आता ही है ; मेरा लक्ष्य क्या है ? मुझे क्या करना चाहिए ? मेरे जीवन की दिशा क्या होगी ?
किसी श्रेष्ठ पुरुष ने कहा हे “जो तुम्हारे ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ के अनुकूल हो वही करो |”
बात बहुत सूक्ष्म हे किन्तु उतनी ही गूढ़ भी| आवश्यकता हमे इसके मूल को समझने की है, तत्पश्च्यात शायद निर्णय इतना कठिन ना हो | ‘स्वधर्म’ को समझने से पूर्व शायद हम अपने विवेक से ‘धर्म’ शब्द को समझे, ‘धर्म’ क्या किसी ईश्वर में विश्वास, किसी परंपरागत पूजा पद्धति को मानना है ? मेरे विचार में धर्म मनुष्य के सहज क्रमिक विकास(evolution) से विकसित हुए नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का अनुसरण एवं सहज प्रवाह मात्र है |
बात आती है ‘स्वधर्म’ की , एक राजा का स्वधर्म है अपनी सम्पूर्ण प्रजा की देखभाल एवं सुरक्षा करना, एक कुम्हार का ‘स्वधर्म’ है उत्तम से उत्तम मटके बनाना , एक पुत्र का स्वधर्म है अपने माता पिता की सेवा | उदहारण अत्यंत सरल एवं सुपाच्य है ; अब बात आती है हमारे स्वधर्म की | प्रश्न का उत्तर सहज रूप से स्वयं के भीतर से ही आना सर्वोत्तम है | हमारी वर्तमान स्तिथि में जितना योगदान हमारी कुशाग्रता का है उतना ही इस देश समाज का है जिसने हमे यह माध्यम या मंच प्रदान किया | जहाँ हमारी प्रतिभा को सही दिशा मिल सके | मेरे मत में यदि हम देश के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान में पढ़ रहे है तो हमारा दायित्व है की हम राष्ट्र ,समाज एवं विश्व के कल्याण के लिए कुछ करे | किन्तु , हमें इसे उऋण होने के रूप में ना लेकर निज कर्तव्य समझना चाहिए |
‘स्वधर्म’ से मेरा तात्पर्य यह नहीं है की हम में से हर एक वैज्ञानिक बने या प्रोध्योकिकी का अध्भुत नमूना प्रस्तुत करे | ना ये सही है और ना ही इसकी आवश्यकता है | स्वधर्म का संक्षिप्त अर्थ दायित्वबोध है |
पूर्व उदाहरण में देखे ; यदि उस राजा की रूचि जीवन के किसी भी और पहलु से अधिक संगीत में है, तो क्या वो गलत है ? यदि उस कुम्हार के पुत्र की रूचि मटके बनाने में ना होकर खगोलियो पिंडो के अध्ययन में है, तो क्या ये गलत है ? मेरे मत में तो नहीं | यह उनकी प्रकृति है और वे स्वयं इसके स्वामी है | किन्तु क्या वे एक उपयुक्त राजा या श्रेष्ठ कुम्हार बन सकते है , इस प्रश्न का उत्तर भी ना ही है |हमारी परिस्थिति इनसे पूर्णतयाः भिन्न है | ना हम इनकी भांति पारिवारिक एवं अनुवांशिक कार्य करने को बाध्य है ना हम पर किसी खास कार्य को करने का दबाव है | आज हम हमारे सभी निर्णय लेने में स्वतन्त्र तथा समर्थ है | तो क्यों ना हम सर्वप्रथम समय देकर अपने स्वभाव को समझे | क्या मुझे वाकई ‘कोडिंग’ में रूचि है या ये मात्र अर्थ(धन) का प्रलोभन है ? क्या मुझे वास्तव में अपने क्षेत्र(ब्रांच) में लगाव है या मात्र अच्छा परिणाम(सी.जी.) बनाए रखने का प्रयास मात्र है ?
 IIT जैसे उच्च स्तरीय संस्थान में हम विकल्पों से बंधे हुए नहीं है; हमारे समक्ष एक विशाल मैदान है, हम में उर्जा है बस हमे दिशा निर्धारण करना है | अतः हमें जरुरत है तो आत्मचिंतन की एवं एक स्फूर्ति की जो हमे अपने अपने लक्ष्य की ओर संलग्न रख सके |
जब हम अपने ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ को भलीभांति समझ लेंगे तब हम निश्चय ही एक अत्यधिक संतुष्ट, सफल एवं समाजोपयोगी मनुष्य बनेंगे तथा विकास के क्रम में प्रत्यक्ष भागीदार बनेंगे |

एक प्रश्न जो सहज में आता है , यदि ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ दोनों विपरीतगामी हो तो ? मेरे विचार में यह जिज्ञासा ना होकर ठीक से मनन ना करने तथा सभी प्रकार से  आत्मावलोकन ना करने का परिणाम है | इस वृहद संसार की एक जीवमान इकाई होने के नाते हमे आवश्यकता है अपने ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ में तादम्यता लाने की अन्यथा हमारा मिथ्या स्वभाव अकर्मण्यता के आवरण में लिपटा हमें अवनति की ओर  अग्रेषित करेगा |

Friday, August 30, 2013

विदाई गीत



आज कुछ चिंतन करूँ, कुछ अतीत का मनन करूँ
जिक्र तुम्हारा लाऊ, या मैं अल्हड स्वप्न बनाऊ
दोनों ओर ही पग रखता हूँ, मैं साथ तुम्हे ही पता हूँ
गीत विदा के गाता हूँ

चार वर्ष चन्दन बन महके जीवन के रूड़की आनन में
सहज सरल स्नेहिल सरसता के तुम सुख साधन हो
तेरे प्रेम के आश्रय में, मैं नित नव उर्जा पाता हूँ
गीत विदा के गाता हूँ

साथ तुम्हारा अच्छा था, ये कहना क्या आवश्यक है ?
मिलने वाले बिछड़ेंगे, ये रीत बदलदे तो जायज़ है ?
मैं सपनों के मूर्त रूप में, सहयोग तुम्हारा पाता हूँ

 गीत विदा के गाता हूँ॥ 

संगम-जलज


रूड़की, १३ मार्च २०१३(DPS के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में )
ध्रुव, श्यामल, निश्छल नयन , शांत, प्रशांत, पुलकित मगन |
निर्मल उर, निष्कपट मन , मधुर, मकरंद, पियूष वचन ||
अचल, गंभीर, स्थिर, चित्त , अनंत, अतल सिन्धु सम |
शाश्वत, प्रफुल, कुमुदित मुकुल सम सदैव मुखरित, हर्षित अधर ||


शांत प्रेमी, निश्चिन्त कामी, संत सम संगम जलज |
ध्येय शिव निर्माल्य जीवन , ध्येय अर्पित अविरल जतन ||
अज्ञेय उन्नत, सिद्ध, सार्थक , बढ़ अजेय पथ, कर्म दृढ, स्थिर लगन |
निज नित्य, तत्सम प्रकृति से प्रकट प्रणव प्रखर प्रबल ||


युगान्तर



हे नव परिवर्तक ! हे नवोन्मेष ! हे  क्रांतिदूत !
त्याग क्रियाहीन अलक्षित जीवन
भ्रमित विश्व , भ्रमित प्रदर्शक
इन बिखरे पदचिन्हों में तू
नवपदचिह्न बनाता चल |

हे तरुण ! हे युगपुरुष ! हे  महाप्राण !
जाग जाग रे जाग ! ओ भारत के भव्य भाल |
हे भरत पुत्र ! हे राष्ट्रपुरुष ! तू जाग !
नव्संकल्प संधारण कर
मातृभूमि का बनकर बल . . . नवपदचिह्न बनाता चल |

हे अजेय ! हे दृढप्रतिज्ञ ! हे पथप्रदर्शक !
पलट देख इतिहास स्वयं का
पदचिन्हों पे चल कर भी
तू महान बना है कभी ?
नई राह चुन, नव उर्जा ले |
नवमंवंतर गढता चल . . . नवपदचिह्न बनाता चल |

हे पार्थसारथी ! हे राघव ! हे विवेकानंद !
तू जाग
हे युवा ! हे तरुण !
अपनी शक्ति पहचान
साथ ले तू बान्धवो को,
कर विजय प्रयाण
संगठित हो , संगठित कर
कदम से कदम मिलाता चल . . . नवपदचिह्न बनाता चल |

हे शोर्यरूप ! हे दिग्विजयी !
हे सेन्य रूप ! राष्ट्र महान !
उठ जाग ! भर हुंकार !
राष्ट्र ध्वज का गौरव बन
कर्तव्यबोध का जगा भाव |

स्वर्णिम इतिहास बनाता चल . . . नवपदचिह्न बनाता चल |


गौरव


यह कहानी पूर्णतयाः काल्पनिक है , इसका किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है | यदि ऐसा है तो इसे मात्र संयोग माना जाए , यह कहानी लेखक की स्वप्रेरणा तथा कल्पनाशीलता की उपज है इसे व्यक्ति विशेष से सम्बंधित मानना कला का अपमान होगा


गौरव एक सुना सुना सा नाम , नाम सुनते ही आपके मष्तिष्क पटल पर कोई ना कोई चित्र उभर आया होगा | खेर ! ये कहानी उनमे से किसी गौरव की नहीं है वरन हर गौरव की है , और अच्छे से कहूँ तो उस गौरव की है जो हम में से हर किसी के अंदर है | अपनी जाग्रत अवस्था में , क्षुप्त अवस्था में या विस्पोटक अवस्था में(Active State, Passive State & Explosive State) |
हम सब की तरह गौरव अपनी स्कूल का टॉपर ही था या शायद सेकंड रेंकर | बचपन से कुछ अलग करने की इच्छा , हर तथ्य को पीछे से देखना , हर सिक्के के दूसरे पहलु को जानने की उत्सुकता , दिनभर दिमाग में बिना काम की जोड़-बाकी करना; सबकुछ तो नोर्मल है ही एक आइआईटीयन(IITIAN) के लिए और अपेक्षा के अनुरूप वो बन भी गया | जब उसने इस हिचकोले खाती नाव में पैर रखा था तब उसने यह नहीं सोचा था की ज्वार बहार से नहीं उसके अंदर से ही उठेगा |
शुरू से पढाई में दम लगाया , पर अंदर ही अंदर कन्फ्युस था ; क्या ये पढाई है , क्या यही मुझे करना है | कभी उसका मन होता की इतना अमीर हो जाऊ की सारी जिंदगी केसिनो में निकाल दू , तो कभी उसकी इच्छा होती की बस अब राइट टाइम है मुझे ही इस देश को बदलना है | वैसे डायलोग (Dialog) मारने में तो वो काफी एक्सपर्ट था ही; कोई उससे पूछता “भाई गौरव तेरी लाइफ का ‘एम’ क्या है”| तो उसका जवाब होता “मेरी लाइफ का यही ‘एम’ है की बस मुझे कोई ‘एम’ मिल जाए”|
इन सब में कब तीन साल निकल गए पता नहीं चला| अंतिम वर्ष में आते-आते गौरव ने कुछ अपने मन के अनुसार चलना सीख ही लिया | अगर उसे गाँव में छोटे बच्चों के साथ अच्छा लगता तो वो अपनी सारी एनर्जी वन्ही झोंक देता, अगर वो किसी की बात से अग्री(agree) नहीं करता तो उससे तब तक दो-दो हाथ करता जब तक या तो वो ना हार मानले या खुद ही हार जाए | उसकी तुनक मिजाजी उसकी arrogance , उसका व्यव्हार , उसकी तथ्यों के पीछे देखने की पुरानी आदत; ये सब उसका ‘स्व’ था | गौरव को उसे बदलना नहीं था वरन उसे ही सही दिशा देकर कुछ कर दिखाना था |
किन्तु एक मनुष्य के जीवन में transition phase एक-आध दिन का नहीं होता ये एक-दो सालो या उससे भी ज्यादा हो सकता है | अब जब गौरव लक्ष्य को उन्मुख हो चलने लगा , सोचने लगा  तब तक  Viscous Forces भी लगना शुरू हो गए थे |  एक मध्यम परिवार का आज्ञाकारी संस्कारी बालक जो माता पिता के लिए अभी भी दस वर्ष का छोटा सा गौरव था | क्या कहेगा वो अपने अभिभावक से ? समझाना या तर्क तो दूर की बात वो अपने विचारों की अभिव्यक्ति कैसे करेगा | तब तक गौरव की एक मस्त सी नौकरी भी लग गयी ; यानि कॉलेज से निकलते ही सोचने के लिए मिलने वाला समय भी खत्म | इन सारे Viscous Forces ने उसकी सोच को, इच्छाशक्ति को दृढ अवश्य कर दिया | आज वो अपने मन की वल्गा खिचने की नहीं वरन ढीली छोड़ने की तैयारी में था | वह अपने वास्तविक स्वरूप को काफी कुछ समझ चुका था| उसने सोच लिया देश के लिए,इस समाज के लिए, और इसकी समस्याओ के निराकरण के लिए वो अपना जीवन लगा देगा |
इतना ही बड़ा ‘एम’ था उसका |
 विषय था transition phase का , गौरव अपने जीवन के उलझे धागे सुलझाते-सुलझाते न जाने कब कॉलेज से उत्तीर्ण भी हो गया और नौकरी भी ज्वाइन कर ली |
पर अब उसके मन के स्वतन्त्र घोड़े उस एक टेबल की सीमा में कैसे रुक सकते थे | उसे तो पूरी दुनिया नापनी थी इन्टरनेट से नहीं अपने पेरो से , उसे तो हजारो लोगो को समझना था , उनके दर्द को जानना था . फेसबुक से नहीं उनके दिलो में झांक कर | रही बात माता-पिता की तो उसे अपने मन की खुश के लिए , अपनी आत्मा की शांति के लिए, अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए उसे उन्हें येनकेनप्रकारेण समझाना ही होगा | आखिर कल गौरव ने केवल दो महीने पच्चीस दिन की नौकरी के बाद मेनेजर को अपना (resignation latter) इस्तीफा दे ही दिया | आज गौरव का जन्मदिन है, आज वो पहले से कही ज्यादा शांतचित्त, प्रस्सन और आह्लादित है |
शायद ये मेरी अल्पबुधि की सीमा से बाहर है की में इस कहानी को आगे सोच सकू , या शायद इसकी जरुरत भी नहीं है | मेरी कहानी अपने ‘क्लाइमेक्स’ पर पहुच गई है | गौरव अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीढी चुका है ; वो अपनी सभी बंधन श्रंखलाए तोड़ चुका है |
क्या किया गौरव ने इसके बाद , पूरा हुआ उसके जीवन का ‘एम’ की, किन उचाइयों पर ले गया उसे उसका स्वतन्त्र मन | मेरे विचार में इन सब प्रश्नों के उत्तर हमे अपने भीतर ही तलाशने की जरुरत है ; साथ ही हमे आवश्यकता हे अपने ‘स्व’ को समझने की तथा अपनी उर्जा को निश्चित दिशा देने की | यह उदहारण हम सब लोगो के लिए है जिनके अंदर का ‘गौरव’ जाग्रत तो है किन्तु स्वर्ण श्रंखलाओ में बंधा हुआ है |

इति || 

Wednesday, August 28, 2013

स्वराज की नींव


रूड़की, वर्ष प्रतिपदा २०७०
पात्र परिचय
महाराज   :     हिन्दवी स्वराज के संस्थापक, छत्रपति शिवाजी महाराज
राजमाता  :     शिवाजी महाराज की माता, जिजाबाई
तानाजी   :     स्वराज के सेनापति, महाराज के ज्येष्ठ सूबेदार एवं अभिन्न मित्र
कानोजी   :     महाराज के सूबेदार
समर्थ     :     सद्गुरु समर्थ गुरु रामदास, चिन्तक, साधक, मुनि, स्वराज के पुरोधा शिवाजी के गुरु एवं प्रेरणा स्त्रोत
केशवदास  :     प्रोढ़ प्रखर सन्यासी , समर्थ के जयेष्ट शिष्य
अर्जुनदास :     समर्थ के आज्ञाकारी शिष्य
गणेशदास :     तरुण सन्यासी, समर्थ के शिष्य



दृश्य १
शिवाजी महाराज का प्रमुख किला रायगढ़, सामरिक एवं राजकीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण, स्वराज की राजधानी, चारो और घने जंगलो से गिरा ऊँचे पर्वत पर स्तिथ अभेध्य दुर्ग |
मुख्यद्वार पर सन्यासी के आगमन का समाचार द्वार रक्षको ने अन्दर भिजवाया | स्वागत के लिए प्रधान सेनापति तानाजी स्वयं द्वार पर आते है |
केशवदास : (भक्ति सागर में डुबकी लगाते हुए संगीतमय स्वरों में गाते है )
मना सज्जना भक्ति पंठेची जावे
तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावे |
जनि निंघ ते सर्व सोडुनी घावे
जनि वंध ते सर्व भावे करावे ||
तानाजी : (मुग्धभाव से अभिवादन में शीश झुकाते हुए ) प्रणाम मुनिश्रेष्ठ ! आपसे यह अमृत वचन सुन तृप्ति हुई | आपसे विशेष अनुरोध है, हमें सेवा का अवसर प्रदान करे |
केशवदास : (आशीर्वाद के लिए हाथ उठाते है ) चिरंजीवी भव ! आपका अनुरोध स्वीकार्य है, किन्तु हमें तुरंत शिवा से मिलना है आप इसका प्रबंध करे |
तानाजी : (विस्मय की मुद्रा में) हे तपस्वी ! आपकी बात मानना कठिन है | महाराज राजकीय कार्यो में अत्यंत व्यस्त है | हम उनके अनुचर राज्य की और से आपकी हर प्रकार की सहायता करने में सक्षम है, आप अपनी आवश्यकता कहिये |
केशवदास : (अट्टहास करते हुए) भाऊरा एक तपस्वी की आवश्यकता की पूर्ति का सामर्थ्य साम्राज्यों में नहीं है | तुम शिवा को कहला भेजो में प्रतीक्षा करता हूँ |
(तानाजी तेज कदमो से बाहर जाते हुए , सन्यासी मंद आवाज में पंक्तिया गुनगुनाते है )



दृश्य २
रायगढ़ के किले के अन्दर एक शांत सभागार, जिसका प्रयोग अत्यंत गोपनीय बैठकों के लिए किया जाता है, सन्यासी एक ओर ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए है | महाराज का लम्बे लम्बे कदमो के साथ कक्ष में प्रवेश, चेहरे से अत्यंत व्यस्तता से आई थकावट के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे है | किन्तु सन्यासी को देखते ही चेहरे की थकान निर्मलता ओर उत्सुकता में बदल जाती है, महाराज साष्टांग दंडवत करते है
महाराज : इस अकिंचन का शत शत प्रणाम ! आपको प्रतीक्षा करवाने के लिए हमें खेद है |
केशवदास : (महाराज को गले लगाते है) यशस्वी भव | विजयी भव |(दोनों अपना अपना आसन गृहण करते है )
मैं तुम्हारे सामने श्री गुरुदेव के दो चार अमूल्य वचन कहने को प्रस्तुत हुआ हूँ |
(महाराज आश्चर्य भाव से तपस्वी को देखते है , फिर उठ कर कपाट बंद करते है )
महाराज : सद्गुरु के वचनों के लिए तो पूरा स्वराज समय निकाल सकता है, मुझे भी उन वीर वचनों से अवगत कराए |
केशवदास : समर्थ ने ‘दासबोध’ नमक एक लघु ग्रन्थ की रचना करी है, कुछ पंक्तिया खास रूप से आपके ध्यान में लाने को कही है |
मना सज्जना भक्ति पंठेची जावे
तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावे |
(महाराज कुछ देर गंभीर चिंतन करते है, फिर निश्चिंत भाव से श्रद्धानत हो पूछते है )
महाराज : समर्थ ने इस ग्रन्थ को रचे कितना समय हो गया है और हमें ‘भक्तिपथ’ पर कब चलने का आदेश दिया है ?
केशवदास : महाराज गुरुदेव ने इसकी रचना चैत्र मास में की थी तथा आपको वर्षा के प्रारंभ के साथ ही ‘भक्तिपथ’ पर चलने का सुझाव दिया है |
महाराज : गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य है | एक और निवेदन था पूर्व के सुदूर ग्रामों में भवानी के पूजन के लिए साधको की आवश्यकता है |
केशवदास : शिवबा इसका अनुरोध में गुरुदेव के सम्मुख प्रस्तुत करता हूँ |
(राजमाता जिजाबाई का स्वर्ण मुद्रिकाओ की पोटली के साथ कक्ष में प्रवेश, राजमाता वृद्ध किन्तु सक्षम एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण, शिवाजी को अत्यंत उच्य कोटि का आत्मविश्वास एवं सुझबुझ माता से ही प्राप्त हुई |)
(पोटली केशवदास की ओर बढ़ाते हुए )
राजमाता : प्रणाम तपस्वी, यह भेंट भवानी के चरणों में |
केशवदास : प्रणाम माता ! धन्यवाद ! आपसे एक और अनुरोध था दक्षिण में अर्जुनदास संलग्न है उन्हें साधनों की आवश्यकता होगी , आप उसकी व्यवस्था देखे |
राजमाता : स्वराज के लिए हम सब ही प्राण-प्रण से समर्पित है, आप निश्चिंत रहे |
(महाराज ओर राजमाता अर्जुनदास को प्रणाम करते है)
महाराज : प्रणाम मुनिवर ! आपका आना सार्थक हो |
केशवदास : हर हर महादेव ! जय जय भवानी !(उद्गोष के साथ केशवदास कक्ष से प्रस्थान करते है, खडाऊ की थक थक दूर जाती हुई | शिवाजी गंभीर चिंतन मुद्रा में बेठे हुए है | )




दृश्य तीन
(समर्थ का आश्रम, शिवनेरी के दुर्ग के पास विस्तृत मैदानों में | छोटी छोटी झोपड़िया तथा यहाँ वहा विचरण करते भगवाधारी सन्यासी | यज्ञ वेदी के चारो ओर सभा बेठी हुई है | एक ऊँचे आसन पर समर्थ गुरुदेव रामदास बेठे हुए है | कसरती शरीर, चेहरे का तेज सहज ही आकृष्ट करने वाला है | देह पर एक कोपीन ओर हाथ में एक कमंडल | पीछे स्वरबध संगीतमय भजो की आवाज , धीरे धीरे क्षीण होती हुई )
अर्जुनदास : सद्गुरु को प्रणाम | आपकी आज्ञाअनुसार सुदूर दक्षिण में बीजापुर के राज्य तक दासबोध का सन्देश जन सामान्य तक पंहुचा दिया है | अकेले बीदर से स्वराज के लिए पांच सो युवक उपस्थित है, रत्नेश्वर में गण्या ओर माधु अपना कार्य करने में संलग्न है | उनकी कुछ चिंताए एवं आवश्यकता है |
समर्थ : श्री राम ! अर्जुन तुम्हारे समाचार सकारात्मक है, किन्तु उनकी चिताव का उत्तर दायित्व नही तुम्हारा ही है, अतः उनका निश्चित समाधान भी आप लोगो को आपस में मिल कर ही करना होगा | हमारा परिव्राजक दल क्या सूचना लाए है ?
गणेशदास : (युवा सन्यासी, उर्जा ओर उत्साह से परिपूर्ण, लम्बे समय से बोलने को तत्पर)  प्रणाम गुरुदेव ! हम परसों ही उत्तर भारत के भ्रमण से लोटे है | दिल्ली तक की हर एक हलचल की खबर है, इधर हेदराबाद को हमने दूसरा दल रवाना कर दिया है | शिवबा का प्रभाव राजपुताना से लेकर अवध और मिथिला क्षेत्र तक है, पुरे भारतवर्ष का जनसामान्य स्वराज के स्वप्न को साकार होते हुए देख रहा है |
समर्थ : अतिउत्तम ! तुम अपने वय से कही अधिक श्रम कर रहे हो, इस महत्वपूर्ण कार्य के बाद अब तुम कुछ दिन यही आश्रम में रह कर ध्यान अध्ययन करो |  केशव शिवबा का क्या समाचार है ?
केशवदास : (हाथ जोड़ विनीत भाव से बोलते है) प्रणाम गुरुदेव ! आपका सन्देश शिवबा तक पंहुचा दिया है, वे आज्ञा पालन को तत्पर है | उन्होंने पूर्व के कुछ गाँवो में स्वराज की अलख जगाने की बात कही है | अर्जुन के लिए साधनों का प्रबंध हो गया है |
समर्थ : (गंभीर मुद्रा में कुछ देर शांत रहते है , फिर आकाश की ओर देख कर बोलते है ) ठीक है ! मैं कुछ शिष्यों सहित जल्दी ही  नसरागढ़ और भाटगढ़ की ओर प्रस्थान करता हूँ | स्वराज में कोई मानुस अपने कर्तव्य पथ से विमुख न रह जाए |
गणेशदास : (कुछ भयभीत ओर संकुचित भाव से ) हे सद्गुरु ! आपकी आज्ञाओ का अक्षरशः पालन होगा | किन्तु..
समर्थ : (तटस्थ होकर ) किन्तु क्या पुत्र ! अपने मन की दुविधा को निसंकोच कहो | अन्यथा तुम अपने अंतरद्वंध से कभी बाहर नहीं निकल पाओगे |
गणेशदास : साहस जुटाकर आपसे कुछ पूछने की चेष्टा कर रहा हूँ | क्या हम ऋषियों सन्यासियों को केवल ध्यान साधना अध्ययन में अपना सामर्थ्य नहीं लगाना चाहिए ? सन्यासी तो संसार से निस्पृह होता है, हमारे लिए तो सम्पूर्ण सृष्टि ही मिथ्या है तथा प्राणीमात्र ब्रह्म है , फिर क्यों हम इतने उद्यम से इस कार्य में संलग्न है ? यह सब कार्य संसारी मनुष्यों का नहीं है ? हमारा धर्म तो केवल उन्हें सही दिशा बताना है |
(सभा में कई तरुणों के मुख पर सहमती के भाव आ गए , वाही कुछ प्रोढ़ साधको के मुख पर मुस्कान बिखर गई )
समर्थ : (मुस्कुराते हुए ) कुमार तुमने अपनी ही नहीं अपने कई साथियों की दुविधा प्रस्तुत की है | (समर्थ ने सभा का सिंहावलोकन किया, सभी के चेहरे सहमति में हिल गए ) मेरा कार्य ही तुम्हे दायित्व बोध कराना है |(अर्धमिलित नेत्रों से ध्यान मुद्रा में आते हुए )हे मानसपुत्रो ! सन्यासी समाज से अपनी कामनाओ को लेकर निस्पृह है | अर्थात वह अपनी किसी भी कामना पूर्ति के लिए समाज पर आश्रित नहीं है वरन एक तपस्वी की तो कोई कामना ही नहीं है | किन्तु वह अपने दायित्व से निस्पृह नहीं है, बल्कि समाज के प्रति उसका दायित्व सर्वाधिक महत्वपूर्ण है | लोकमत परिष्कार का कार्य सन्यासी ही तो करेगा, समाज को सही दिशा देने के साथ उसके उस और अग्रसर होने का कार्य भी हमारे ऊपर ही है | इस ताप को करने वाला ही सच्चे अर्थो में तपस्वी है | यदि अधर्म की सत्ता प्रबल होने लगे तो उस समय हर एक साधक का दायित्व है की वह धर्म की पुनर्स्थापना में अहर्निश लगा रहे | व्यक्ति समाज से अविभाज्य है फिर वह चाहे सन्यासी ही क्यों नहीं हो | कंदराओ में बैठ कर भी हम समाज की मंगल कामना की ही प्रार्थना करते है तो फिर अपने प्रत्यक्ष कर्मो से क्यों नहीं | सबसे महत्वपूर्ण बात, जन मानस की चेतना का पुनर्जागरण, उन्हें अधर्म एवं असत्य से लड़ने के लिए प्रेरित करना तथा उसे अपने सामर्थ्य का भान करना ये कार्य एक परिव्राजक से बेहत्तर कौन कर सकता है |(अपने आसन से उठ का गणेशदास के कंधो पर हाथ रखते हुए ) कुमार ! एक बात और जान लो एक कमजोर को शक्ति का भान करके, एक भीरु को निर्भीक बनाकर तथा असत्य की सत्ता उखाड़ फेंकने से जो तुम्हारी अध्यात्मिक उन्नति होगी वह अतुलनीय है| पूर्ण निष्काम एवं निस्वार्थ भाव से किया गया एक एक प्रयास समाज एवं व्यक्ति को उन्नति की और अग्रसर करेगा | (सम्पूर्ण सभा को मुखर हो अपनी वज्र सी कठोर वाणी में )अतः तुम अपना स्वधर्म समझो और उसका पालन करो | जय श्री राम |
(इसी के साथ घोष हुआ )
जय जय रघुबीर समर्थ ||




दृश्य चार
(रायगढ़ के सभा प्रांगन में सभी सभासद अपने आसनों पर बैठे है, सिंहासन पर छत्रपति एवं दाई ओर राजमाता जिजाबाई विराजित है, वैदिक मंत्रोचार के साथ सभा शुरू होती है | )
कानोजी : (चिंता और उत्सुकता के समिश्रण से आई उद्विग्नता के साथ ) शिवबा इतनी शीघ्रता से सभा बुलाने का क्या हेतु है ? क्या स्वराज पर कोई बड़ा संकट आ गया है ?
महाराज : मित्रो ! यह परीक्षा की घडी है, आज पुरे मराठा में एक चेतना की लहर फ़ैल रही है | जन सामान्य की चेतना जागृत है, हमारी सामरिक शक्ति बढ़ रही है | किन्तु... (एक दीर्घश्वास लेकर ) इधर मात खाया अरिदल भी पैतरे बदल रहा है | हमे अपने विश्वस्ततम सूत्रों से पता चला है की आदिलशाही ओर बीजापुर के नवाब ने हेदराबाद के निज़ाम के साथ मिल तिहरे आक्रमण की सुनियोजित योजना बनाई है |
तानाजी : महाराज हमें हमारी रणनीति में कई बदलाव करने पड़ेंगे, यह सूचना कब की है तथा इसकी संभावना कब है ?
महाराज : यह लगभग एक मास पहले की सूचना है तथा हमारे पास लगभग दो मास का समय है | इस बार हम शत्रुओ से दो कदम आगे ही है |
(शिवाजी अपने आसन से उठते है ओर सभा के बिच में आ जाते है, उत्साह ओर जोश के साथ ) कोण बाबा ! आप ओर कानोजी गुरुदेव से संपर्क साधे, वे गाँव गाँव में स्वराज के रक्षार्थ युवक तैयार कर रहे है, आप उनके सुनियोजन की व्यवस्था करे | तानाजी ओर विठोजी ! हम चाहते है की आप मावलो को लेकर दक्षिण में सुरक्षा सुदृढ़ करे तथा निज़ाम की हर गतिविधि पर नज़र रखे | (सभी सभा सद अपने आसन से उठ जाते है, शिवाजी म्यान से अपनी विजयी तलवार निकलते है ) बांधवों ! एक बार फिर रणभेरी बज चुकी है, इस समय शत्रु संगठित है किन्तु हमारी शक्ति भी पहले से दोगुनी है | साथ ही माता भवानी का आशीर्वाद हम सब के ऊपर है | विजय का कोई विकल्प नहीं है, विजय अनिवार्य है |
हर  हर महादेव !!!
(सम्पूर्ण सभागार में हुंकार उठी )
हर हर महादेव !! जय जय भवानी !! हर हर महादेव !!