मैं गीत नहीं बन सकता, मैं उद्घोष बनने निकला हूँ। मैं हस्त लगाव नहीं दिखा पाउँगा, एक प्रहार ही कर देता हूँ। मैं संयमित ज्ञानी नहीं, मैं उद्वेलित अज्ञानी हूँ। मैं जीवन का मधुर राग नहीं, में कर्कश कोलाहल हूँ। मैं अनुकूलन का नहीं, परिवर्तन का अधिनायक हूँ॥
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