Sunday, September 1, 2013

मैं परिवर्तन का अधिनायक हूँ


क्या राम प्रतीक्षा करता अपने बंधु-बांधव की?
क्या राम साधना करता देंवो की, प्रतिमाओ की?
क्या राम ठहर जाता तूफ़ानो में, मझाधारों में,
क्या राम सहन करता नित नए अरिदल के आघातो को?
क्या राम समझ लेता कोशिश मेरे वश में इतनी थी,
क्या राम मान लेता उसके भुजदंडो की क्षमता बस इतनी थी?
क्या राम समर्पण करता नियती के आलेखो को?
क्या राम निम्नतर कहता भाग्य से प्रयत्नों को?

नहीं, कदाचित्  नहीं
राम पुरुषार्थ का पूर्ण प्रदर्शन है,
राम जीवन की गति का उद्बोधन है। 
राम नहीं ठहरता तूफ़ानो में मझाधारों में,
वह तिनका भी हो तो लड़ता उसके प्रचंड आघातो से
राम समझ ना लेता की नियती का यह लेखा है। 
वह भाग्य कालेख बदल देता अपने कोदंड और बाणों से॥  



और यदि हाँ,
तो अब लक्ष्मण हमको बनाना है,
इन झंझावातो में निर्भीक हो लड़ना है
रहना है उद्वेलित क्यूंकि संयम का समय नहीं
है कर्म हमारे कर में, अब कर्म की रेखा को बदलना है॥  

है ज्ञान मुझे सिद्धांतो का नीति से उधृत भाष्यों का,
है सम्मान मुझे  गीता का, गीता के आदर्शो का। 

पर अब मेरी उत्कंठा मुझे उनसे पदच्युत करती है,
मुझे लक्ष्य को पाने को सदा उद्वेलित रखती है। 
अब प्रयासो के लिए नहीं परिणामों के लिए मैं चिंतित हूँ,
अब आशाओ से नहीं निष्कर्षो से में बंधित हूँ,
अब में उद्बोधन का नहीं उत्थानों का परिचायक हूँ। 
मैं दिव्यज्योति का नहीं उस विराट का दर्शन हूँ॥ 

है ये बाल मन की कोरी आकांक्षा ये उसका भोलापन है,
ये अल्प ज्ञान का निष्कर्ष ये कम समाज का चित्रण है। 
आवश्कता है सहज सुदृढ़ प्रयासों की,
शने शने परिस्थिति के अनुकूलन की। 
क्या हम उसमें सक्षम हो ये चिंतन भी आवशक है?
मुझे विश्वास है तुम और तुम्हारे प्रयासो पर
क्योंकि मैं इस उत्कंठा से अभिमंत्रित हूँ.
क्षमाप्रार्थी हूँ सहयोग तुम्हारा ना दे पाउँगा। 
अपने मन की इस श्लागा को अब में समेट ना पाउँगा॥ 

अब मैं अपने अश्वो को बंध मुक्त कर देता हूँ। 
मैं गीत नहीं बन सकता, मैं उद्घोष बनने निकला हूँ। 
मैं हस्त लगाव नहीं दिखा पाउँगा, एक प्रहार ही कर देता हूँ। 
मैं संयमित ज्ञानी नहीं, मैं उद्वेलित अज्ञानी हूँ। 
मैं जीवन का मधुर राग नहीं, में कर्कश कोलाहल हूँ। 
मैं अनुकूलन का नहीं, परिवर्तन का अधिनायक हूँ॥


Saturday, August 31, 2013

जीवन

जीवन इतना बुरा नहीं है पगले, जितना तूने मान लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का, चादर खुद पर तान लिया है ||

हर बाधा से डरता आया, डरता-डरता लड़ता आया |
पग-पग पर तू ठोकर खाता, गिरता संभलता फिर गिर जाता ||
लेकिन पथ को जैसा मान रहा है पगले, क्या पूरा तूने जान लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का,  चादर खुद पर तान लिया है ||
जीवन इतना बुरा नहीं है पगले|

खुशियों की चाह में तूने, कोरे भ्रम को गले लगाया |
फिर उसके परिचित आघातों से, क्यों तू बचता भाग रहा है ||
घाव इतना गहरा नहीं है पगले, जितना तूने मान लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का,  चादर खुद पर तान लिया है ||
जीवन इतना बुरा नहीं है पगले

इस संसार से प्रीत लगाईं, प्रीत लगाईं रीत निभाई |
फिर संसार की रीत के आगे, क्यों खुद को ही हार रहा है ||
मोह-माया छोड़ रे पगले, खुद से वैर ही पाल लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का,  चादर खुद पर तान लिया है ||

जीवन इतना बुरा नहीं है पगले…।

साधो रे मन को साधो रे


जीवन भर का सौदा रे
पथ पढ़े, पढ़ कर के सीखे
मैदान ना उतना आसां रे
खेले जीते बहुत बचपन से
अब हारन की आदत डालो रे
साधो रे मन को साधो रे

नाव फंसी तेरी बिच धार में
झटपट हाथ चलाना रे
धीरे जो तू जतन करे तो
संग प्रवाह बह जाना रे
उलटी धरा नौका खेनी
मन पतवार अब धारो रे

बेल चढ़े रस्सी के सहारे
कुसुमलता मुस्काना रे
जो रस्सी का संग हे छुटा
टूट धरा मिल जाना रे
साथी कब तक थाम सकेगा
आप ही जड़े जमाओ रे                                      
साधो रे मन को साधो रे

मन मकड़ी सैम झाल बिछाए
तुझे ही उस में फांसा रे
रहे सदा बहलाता तुझको
लघु स्वप्न उलझाना रे
मकड़ी ही खुद ना फंसे झाल में
उस जस पग पग धारो रे
साधो रे मन को साधो रे

कहे संत संतोष सुख साधन
अर्थ अनर्थ कर जाना रे
वे संतोष फल मांहि पाए
मन तेरो कर्म से पाना रे
करम संतोष कंहा मेरे बन्धु
प्रतिक्षण अछय प्रयासा रे
साधो रे मन को साधो रे  


जनक



मंद मग्न दृढनिश्चयी क्लांत, चढ़ रहा क्षितिज रवि रश्मिकांत। 
अविरल अनथक निष्काम कर्मठ, सम्पूर्ण जीवन पूर्ण अर्पण॥ 
प्रखर प्रबल प्रबुद्ध प्रकाश, उषा संध्या अनवरत प्रयास। 
सुख शांतिदायक दिप्तिपुन्ज, अक्षय उर्जा संचरण॥ 
सत्य साधक शुध्ह चिन्तक, रक्षक संरक्षक मार्गदर्शक।  
परहित समर्पित सदैव तत्पर, हे ! सूर्य रूप जनक प्रणाम॥ 

स्थितप्रज्ञ स्थिरचित्त, चेतन निरंतर निश्चिन्त शांत।   
शांत शुद्ध पवित्र सात्विक, सत्य समर्पित आचरण॥ 
कृष्ण शुक्ल समभाव से, अकर्ता कर्म शुद्ध चित्रण। 
आश्रय आनंद स्नेह सहस सकल सरस स्त्रवन॥ 
व्योम मंडित तामस खंडन, नक्षत्र नय नभपति विशाल। 

रजनी प्रहार पथ प्रदर्शक, हे ! चन्द्र रूप पिता प्रणाम॥ 

स्वधर्म एवं स्वभाव

जीवन के किसी ना किसी पड़ाव पर यह प्रश्न अवश्य आता ही है ; मेरा लक्ष्य क्या है ? मुझे क्या करना चाहिए ? मेरे जीवन की दिशा क्या होगी ?
किसी श्रेष्ठ पुरुष ने कहा हे “जो तुम्हारे ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ के अनुकूल हो वही करो |”
बात बहुत सूक्ष्म हे किन्तु उतनी ही गूढ़ भी| आवश्यकता हमे इसके मूल को समझने की है, तत्पश्च्यात शायद निर्णय इतना कठिन ना हो | ‘स्वधर्म’ को समझने से पूर्व शायद हम अपने विवेक से ‘धर्म’ शब्द को समझे, ‘धर्म’ क्या किसी ईश्वर में विश्वास, किसी परंपरागत पूजा पद्धति को मानना है ? मेरे विचार में धर्म मनुष्य के सहज क्रमिक विकास(evolution) से विकसित हुए नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का अनुसरण एवं सहज प्रवाह मात्र है |
बात आती है ‘स्वधर्म’ की , एक राजा का स्वधर्म है अपनी सम्पूर्ण प्रजा की देखभाल एवं सुरक्षा करना, एक कुम्हार का ‘स्वधर्म’ है उत्तम से उत्तम मटके बनाना , एक पुत्र का स्वधर्म है अपने माता पिता की सेवा | उदहारण अत्यंत सरल एवं सुपाच्य है ; अब बात आती है हमारे स्वधर्म की | प्रश्न का उत्तर सहज रूप से स्वयं के भीतर से ही आना सर्वोत्तम है | हमारी वर्तमान स्तिथि में जितना योगदान हमारी कुशाग्रता का है उतना ही इस देश समाज का है जिसने हमे यह माध्यम या मंच प्रदान किया | जहाँ हमारी प्रतिभा को सही दिशा मिल सके | मेरे मत में यदि हम देश के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान में पढ़ रहे है तो हमारा दायित्व है की हम राष्ट्र ,समाज एवं विश्व के कल्याण के लिए कुछ करे | किन्तु , हमें इसे उऋण होने के रूप में ना लेकर निज कर्तव्य समझना चाहिए |
‘स्वधर्म’ से मेरा तात्पर्य यह नहीं है की हम में से हर एक वैज्ञानिक बने या प्रोध्योकिकी का अध्भुत नमूना प्रस्तुत करे | ना ये सही है और ना ही इसकी आवश्यकता है | स्वधर्म का संक्षिप्त अर्थ दायित्वबोध है |
पूर्व उदाहरण में देखे ; यदि उस राजा की रूचि जीवन के किसी भी और पहलु से अधिक संगीत में है, तो क्या वो गलत है ? यदि उस कुम्हार के पुत्र की रूचि मटके बनाने में ना होकर खगोलियो पिंडो के अध्ययन में है, तो क्या ये गलत है ? मेरे मत में तो नहीं | यह उनकी प्रकृति है और वे स्वयं इसके स्वामी है | किन्तु क्या वे एक उपयुक्त राजा या श्रेष्ठ कुम्हार बन सकते है , इस प्रश्न का उत्तर भी ना ही है |हमारी परिस्थिति इनसे पूर्णतयाः भिन्न है | ना हम इनकी भांति पारिवारिक एवं अनुवांशिक कार्य करने को बाध्य है ना हम पर किसी खास कार्य को करने का दबाव है | आज हम हमारे सभी निर्णय लेने में स्वतन्त्र तथा समर्थ है | तो क्यों ना हम सर्वप्रथम समय देकर अपने स्वभाव को समझे | क्या मुझे वाकई ‘कोडिंग’ में रूचि है या ये मात्र अर्थ(धन) का प्रलोभन है ? क्या मुझे वास्तव में अपने क्षेत्र(ब्रांच) में लगाव है या मात्र अच्छा परिणाम(सी.जी.) बनाए रखने का प्रयास मात्र है ?
 IIT जैसे उच्च स्तरीय संस्थान में हम विकल्पों से बंधे हुए नहीं है; हमारे समक्ष एक विशाल मैदान है, हम में उर्जा है बस हमे दिशा निर्धारण करना है | अतः हमें जरुरत है तो आत्मचिंतन की एवं एक स्फूर्ति की जो हमे अपने अपने लक्ष्य की ओर संलग्न रख सके |
जब हम अपने ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ को भलीभांति समझ लेंगे तब हम निश्चय ही एक अत्यधिक संतुष्ट, सफल एवं समाजोपयोगी मनुष्य बनेंगे तथा विकास के क्रम में प्रत्यक्ष भागीदार बनेंगे |

एक प्रश्न जो सहज में आता है , यदि ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ दोनों विपरीतगामी हो तो ? मेरे विचार में यह जिज्ञासा ना होकर ठीक से मनन ना करने तथा सभी प्रकार से  आत्मावलोकन ना करने का परिणाम है | इस वृहद संसार की एक जीवमान इकाई होने के नाते हमे आवश्यकता है अपने ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ में तादम्यता लाने की अन्यथा हमारा मिथ्या स्वभाव अकर्मण्यता के आवरण में लिपटा हमें अवनति की ओर  अग्रेषित करेगा |

Friday, August 30, 2013

विदाई गीत



आज कुछ चिंतन करूँ, कुछ अतीत का मनन करूँ
जिक्र तुम्हारा लाऊ, या मैं अल्हड स्वप्न बनाऊ
दोनों ओर ही पग रखता हूँ, मैं साथ तुम्हे ही पता हूँ
गीत विदा के गाता हूँ

चार वर्ष चन्दन बन महके जीवन के रूड़की आनन में
सहज सरल स्नेहिल सरसता के तुम सुख साधन हो
तेरे प्रेम के आश्रय में, मैं नित नव उर्जा पाता हूँ
गीत विदा के गाता हूँ

साथ तुम्हारा अच्छा था, ये कहना क्या आवश्यक है ?
मिलने वाले बिछड़ेंगे, ये रीत बदलदे तो जायज़ है ?
मैं सपनों के मूर्त रूप में, सहयोग तुम्हारा पाता हूँ

 गीत विदा के गाता हूँ॥ 

संगम-जलज


रूड़की, १३ मार्च २०१३(DPS के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में )
ध्रुव, श्यामल, निश्छल नयन , शांत, प्रशांत, पुलकित मगन |
निर्मल उर, निष्कपट मन , मधुर, मकरंद, पियूष वचन ||
अचल, गंभीर, स्थिर, चित्त , अनंत, अतल सिन्धु सम |
शाश्वत, प्रफुल, कुमुदित मुकुल सम सदैव मुखरित, हर्षित अधर ||


शांत प्रेमी, निश्चिन्त कामी, संत सम संगम जलज |
ध्येय शिव निर्माल्य जीवन , ध्येय अर्पित अविरल जतन ||
अज्ञेय उन्नत, सिद्ध, सार्थक , बढ़ अजेय पथ, कर्म दृढ, स्थिर लगन |
निज नित्य, तत्सम प्रकृति से प्रकट प्रणव प्रखर प्रबल ||