Saturday, August 31, 2013

साधो रे मन को साधो रे


जीवन भर का सौदा रे
पथ पढ़े, पढ़ कर के सीखे
मैदान ना उतना आसां रे
खेले जीते बहुत बचपन से
अब हारन की आदत डालो रे
साधो रे मन को साधो रे

नाव फंसी तेरी बिच धार में
झटपट हाथ चलाना रे
धीरे जो तू जतन करे तो
संग प्रवाह बह जाना रे
उलटी धरा नौका खेनी
मन पतवार अब धारो रे

बेल चढ़े रस्सी के सहारे
कुसुमलता मुस्काना रे
जो रस्सी का संग हे छुटा
टूट धरा मिल जाना रे
साथी कब तक थाम सकेगा
आप ही जड़े जमाओ रे                                      
साधो रे मन को साधो रे

मन मकड़ी सैम झाल बिछाए
तुझे ही उस में फांसा रे
रहे सदा बहलाता तुझको
लघु स्वप्न उलझाना रे
मकड़ी ही खुद ना फंसे झाल में
उस जस पग पग धारो रे
साधो रे मन को साधो रे

कहे संत संतोष सुख साधन
अर्थ अनर्थ कर जाना रे
वे संतोष फल मांहि पाए
मन तेरो कर्म से पाना रे
करम संतोष कंहा मेरे बन्धु
प्रतिक्षण अछय प्रयासा रे
साधो रे मन को साधो रे  


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