Saturday, August 31, 2013

जीवन

जीवन इतना बुरा नहीं है पगले, जितना तूने मान लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का, चादर खुद पर तान लिया है ||

हर बाधा से डरता आया, डरता-डरता लड़ता आया |
पग-पग पर तू ठोकर खाता, गिरता संभलता फिर गिर जाता ||
लेकिन पथ को जैसा मान रहा है पगले, क्या पूरा तूने जान लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का,  चादर खुद पर तान लिया है ||
जीवन इतना बुरा नहीं है पगले|

खुशियों की चाह में तूने, कोरे भ्रम को गले लगाया |
फिर उसके परिचित आघातों से, क्यों तू बचता भाग रहा है ||
घाव इतना गहरा नहीं है पगले, जितना तूने मान लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का,  चादर खुद पर तान लिया है ||
जीवन इतना बुरा नहीं है पगले

इस संसार से प्रीत लगाईं, प्रीत लगाईं रीत निभाई |
फिर संसार की रीत के आगे, क्यों खुद को ही हार रहा है ||
मोह-माया छोड़ रे पगले, खुद से वैर ही पाल लिया है |
घोर निराशा अविश्वास का,  चादर खुद पर तान लिया है ||

जीवन इतना बुरा नहीं है पगले…।

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