आज सवेरे जब कलम उठाई, एक हिलोर फिर मन में आई,
पर हाथ नजाने क्यों चले नहीं, भाव शब्द फिर बने नहीं |
मन से तरंग उठी तो थी, किस बिच भंवर में उलझ गई,
बहती नित परिचित सागर में आज नई राह पर भटक गई ||
सोचा मै कैसा लिखता हूँ, जैसा भी हो क्यूं लिखता हूँ ?
मेरे लिखने का भाव है क्या, मेरे लिखने में रस है क्या ?
निश्चय ही रस सागर से मोती चुनना ही उद्येश्य
नहीं
लौटाने को माता का ऋण, स्वधर्म अबाध्य कर्तव्य यही ||
किन्तु क्या इस प्रयास में, साहित्य कला से न्याय हुआ है
मेरी किंचित रचनाओ से, निज भाषा का उन्नयन हुआ है |
मन की तरंग हो गई विलीन, एक नए उदधि में समा गई
भावों का भंवर रुका नहीं, पर आज कलम फिर अटक गई ||
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