रूड़की, वर्ष
प्रतिपदा २०७०
पात्र परिचय
महाराज : हिन्दवी स्वराज के संस्थापक, छत्रपति शिवाजी महाराज
राजमाता : शिवाजी महाराज की माता, जिजाबाई
तानाजी : स्वराज के सेनापति, महाराज के ज्येष्ठ सूबेदार एवं अभिन्न मित्र
कानोजी : महाराज के सूबेदार
समर्थ : सद्गुरु समर्थ गुरु रामदास, चिन्तक, साधक, मुनि, स्वराज के पुरोधा
शिवाजी के गुरु एवं प्रेरणा स्त्रोत
केशवदास : प्रोढ़ प्रखर सन्यासी , समर्थ के जयेष्ट शिष्य
अर्जुनदास : समर्थ के आज्ञाकारी शिष्य
गणेशदास : तरुण सन्यासी, समर्थ के शिष्य
दृश्य १
शिवाजी महाराज का प्रमुख किला रायगढ़, सामरिक एवं
राजकीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण, स्वराज की राजधानी, चारो और घने जंगलो से
गिरा ऊँचे पर्वत पर स्तिथ अभेध्य दुर्ग |
मुख्यद्वार पर सन्यासी के आगमन का समाचार द्वार
रक्षको ने अन्दर भिजवाया | स्वागत के लिए प्रधान सेनापति तानाजी स्वयं द्वार पर
आते है |
केशवदास : (भक्ति सागर में डुबकी लगाते हुए
संगीतमय स्वरों में गाते है )
मना सज्जना भक्ति
पंठेची जावे
तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावे |
जनि निंघ ते सर्व सोडुनी घावे
जनि वंध ते सर्व भावे करावे ||
तानाजी : (मुग्धभाव से अभिवादन में शीश झुकाते
हुए ) प्रणाम मुनिश्रेष्ठ
! आपसे यह अमृत वचन सुन तृप्ति हुई | आपसे विशेष अनुरोध है, हमें सेवा का अवसर
प्रदान करे |
केशवदास : (आशीर्वाद के लिए हाथ उठाते है ) चिरंजीवी भव ! आपका अनुरोध स्वीकार्य है, किन्तु
हमें तुरंत शिवा से मिलना है आप इसका प्रबंध करे |
तानाजी : (विस्मय की मुद्रा में) हे तपस्वी ! आपकी बात मानना कठिन है | महाराज
राजकीय कार्यो में अत्यंत व्यस्त है | हम उनके अनुचर राज्य की और से आपकी हर
प्रकार की सहायता करने में सक्षम है, आप अपनी आवश्यकता कहिये |
केशवदास : (अट्टहास करते हुए) भाऊरा एक तपस्वी की
आवश्यकता की पूर्ति का सामर्थ्य साम्राज्यों में नहीं है | तुम शिवा को कहला भेजो
में प्रतीक्षा करता हूँ |
(तानाजी तेज कदमो से बाहर जाते हुए , सन्यासी मंद
आवाज में पंक्तिया गुनगुनाते है )
दृश्य २
रायगढ़ के किले के अन्दर एक शांत सभागार, जिसका
प्रयोग अत्यंत गोपनीय बैठकों के लिए किया जाता है, सन्यासी एक ओर ध्यान की मुद्रा
में बैठे हुए है | महाराज का लम्बे लम्बे कदमो के साथ कक्ष में प्रवेश, चेहरे से
अत्यंत व्यस्तता से आई थकावट के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे है | किन्तु सन्यासी को
देखते ही चेहरे की थकान निर्मलता ओर उत्सुकता में बदल जाती है, महाराज साष्टांग
दंडवत करते है
महाराज : इस अकिंचन का शत शत प्रणाम ! आपको
प्रतीक्षा करवाने के लिए हमें खेद है |
केशवदास : (महाराज को गले लगाते है) यशस्वी भव | विजयी भव |(दोनों अपना अपना आसन गृहण
करते है )
मैं तुम्हारे सामने श्री गुरुदेव के दो चार
अमूल्य वचन कहने को प्रस्तुत हुआ हूँ |
(महाराज आश्चर्य भाव से तपस्वी को देखते है , फिर
उठ कर कपाट बंद करते है )
महाराज : सद्गुरु के वचनों के लिए तो पूरा स्वराज समय
निकाल सकता है, मुझे भी उन वीर वचनों से अवगत कराए |
केशवदास : समर्थ ने ‘दासबोध’ नमक एक लघु ग्रन्थ की रचना करी
है, कुछ पंक्तिया खास रूप से आपके ध्यान में लाने को कही है |
मना सज्जना भक्ति
पंठेची जावे
तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावे |
(महाराज कुछ देर गंभीर चिंतन करते है, फिर
निश्चिंत भाव से श्रद्धानत हो पूछते है )
महाराज : समर्थ ने इस ग्रन्थ को रचे कितना समय हो
गया है और हमें ‘भक्तिपथ’ पर कब चलने का आदेश दिया है ?
केशवदास : महाराज गुरुदेव ने इसकी रचना चैत्र मास में की थी
तथा आपको वर्षा के प्रारंभ के साथ ही ‘भक्तिपथ’ पर चलने का सुझाव दिया है |
महाराज : गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य है | एक और निवेदन
था पूर्व के सुदूर ग्रामों में भवानी के पूजन के लिए साधको की आवश्यकता है |
केशवदास : शिवबा इसका अनुरोध में गुरुदेव के सम्मुख
प्रस्तुत करता हूँ |
(राजमाता जिजाबाई का स्वर्ण मुद्रिकाओ की पोटली
के साथ कक्ष में प्रवेश, राजमाता वृद्ध किन्तु सक्षम एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण,
शिवाजी को अत्यंत उच्य कोटि का आत्मविश्वास एवं सुझबुझ माता से ही प्राप्त हुई |)
(पोटली केशवदास की ओर बढ़ाते हुए )
राजमाता : प्रणाम तपस्वी, यह भेंट भवानी के चरणों में |
केशवदास : प्रणाम माता ! धन्यवाद ! आपसे एक और अनुरोध था
दक्षिण में अर्जुनदास संलग्न है उन्हें साधनों की आवश्यकता होगी , आप उसकी
व्यवस्था देखे |
राजमाता : स्वराज के लिए हम सब ही प्राण-प्रण से समर्पित
है, आप निश्चिंत रहे |
(महाराज ओर राजमाता अर्जुनदास को प्रणाम करते है)
महाराज : प्रणाम मुनिवर ! आपका आना सार्थक हो |
केशवदास : हर हर महादेव ! जय जय भवानी !(उद्गोष के साथ
केशवदास कक्ष से प्रस्थान करते है, खडाऊ की थक थक दूर जाती हुई | शिवाजी गंभीर
चिंतन मुद्रा में बेठे हुए है | )
दृश्य तीन
(समर्थ का आश्रम, शिवनेरी के दुर्ग के पास विस्तृत मैदानों में | छोटी
छोटी झोपड़िया तथा यहाँ वहा विचरण करते भगवाधारी सन्यासी | यज्ञ वेदी के चारो ओर
सभा बेठी हुई है | एक ऊँचे आसन पर समर्थ गुरुदेव रामदास बेठे हुए है | कसरती शरीर,
चेहरे का तेज सहज ही आकृष्ट करने वाला है | देह पर एक कोपीन ओर हाथ में एक कमंडल |
पीछे स्वरबध संगीतमय भजो की आवाज , धीरे धीरे क्षीण होती हुई )
अर्जुनदास : सद्गुरु को प्रणाम | आपकी आज्ञाअनुसार सुदूर
दक्षिण में बीजापुर के राज्य तक दासबोध का सन्देश जन सामान्य तक पंहुचा दिया है |
अकेले बीदर से स्वराज के लिए पांच सो युवक उपस्थित है, रत्नेश्वर में गण्या ओर
माधु अपना कार्य करने में संलग्न है | उनकी कुछ चिंताए एवं आवश्यकता है |
समर्थ : श्री राम ! अर्जुन तुम्हारे समाचार सकारात्मक
है, किन्तु उनकी चिताव का उत्तर दायित्व नही तुम्हारा ही है, अतः उनका निश्चित
समाधान भी आप लोगो को आपस में मिल कर ही करना होगा | हमारा परिव्राजक दल क्या
सूचना लाए है ?
गणेशदास : (युवा सन्यासी, उर्जा ओर उत्साह से
परिपूर्ण, लम्बे समय से बोलने को तत्पर) प्रणाम
गुरुदेव ! हम परसों ही उत्तर भारत के भ्रमण से लोटे है | दिल्ली तक की हर एक हलचल
की खबर है, इधर हेदराबाद को हमने दूसरा दल रवाना कर दिया है | शिवबा का प्रभाव
राजपुताना से लेकर अवध और मिथिला क्षेत्र तक है, पुरे भारतवर्ष का जनसामान्य
स्वराज के स्वप्न को साकार होते हुए देख रहा है |
समर्थ : अतिउत्तम ! तुम अपने वय से कही अधिक श्रम कर रहे
हो, इस महत्वपूर्ण कार्य के बाद अब तुम कुछ दिन यही आश्रम में रह कर ध्यान अध्ययन
करो | केशव शिवबा का क्या समाचार है ?
केशवदास : (हाथ जोड़ विनीत भाव से बोलते है) प्रणाम गुरुदेव
! आपका सन्देश शिवबा तक पंहुचा दिया है, वे आज्ञा पालन को तत्पर है | उन्होंने
पूर्व के कुछ गाँवो में स्वराज की अलख जगाने की बात कही है | अर्जुन के लिए साधनों
का प्रबंध हो गया है |
समर्थ : (गंभीर मुद्रा में कुछ देर शांत रहते है , फिर
आकाश की ओर देख कर बोलते है ) ठीक है ! मैं कुछ शिष्यों सहित जल्दी ही नसरागढ़
और भाटगढ़ की ओर प्रस्थान करता हूँ | स्वराज में कोई मानुस अपने कर्तव्य पथ से
विमुख न रह जाए |
गणेशदास : (कुछ भयभीत ओर संकुचित भाव से ) हे सद्गुरु !
आपकी आज्ञाओ का अक्षरशः पालन होगा | किन्तु..
समर्थ : (तटस्थ होकर ) किन्तु क्या पुत्र ! अपने मन की
दुविधा को निसंकोच कहो | अन्यथा तुम अपने अंतरद्वंध से कभी बाहर नहीं निकल पाओगे |
गणेशदास : साहस जुटाकर आपसे कुछ पूछने की चेष्टा कर रहा हूँ
| क्या हम ऋषियों सन्यासियों को केवल ध्यान साधना अध्ययन में अपना सामर्थ्य नहीं
लगाना चाहिए ? सन्यासी तो संसार से निस्पृह होता है, हमारे लिए तो सम्पूर्ण सृष्टि
ही मिथ्या है तथा प्राणीमात्र ब्रह्म है , फिर क्यों हम इतने उद्यम से इस कार्य
में संलग्न है ? यह सब कार्य संसारी मनुष्यों का नहीं है ? हमारा धर्म तो केवल
उन्हें सही दिशा बताना है |
(सभा में कई तरुणों के मुख पर सहमती के भाव आ गए
, वाही कुछ प्रोढ़ साधको के मुख पर मुस्कान बिखर गई )
समर्थ : (मुस्कुराते हुए ) कुमार तुमने अपनी ही नहीं अपने
कई साथियों की दुविधा प्रस्तुत की है | (समर्थ ने सभा का सिंहावलोकन किया, सभी के
चेहरे सहमति में हिल गए ) मेरा कार्य ही तुम्हे दायित्व बोध कराना है |(अर्धमिलित नेत्रों से ध्यान मुद्रा में आते हुए )हे मानसपुत्रो ! सन्यासी समाज से अपनी कामनाओ को
लेकर निस्पृह है | अर्थात वह अपनी किसी भी कामना पूर्ति के लिए
समाज पर आश्रित नहीं है वरन एक तपस्वी की तो कोई कामना ही नहीं है | किन्तु वह अपने दायित्व से निस्पृह नहीं है, बल्कि समाज के प्रति उसका दायित्व सर्वाधिक
महत्वपूर्ण है | लोकमत परिष्कार का कार्य सन्यासी ही तो करेगा, समाज को सही दिशा देने के साथ उसके उस और अग्रसर
होने का कार्य भी हमारे ऊपर ही है | इस ताप को करने वाला
ही सच्चे अर्थो में तपस्वी है | यदि अधर्म की सत्ता
प्रबल होने लगे तो उस समय हर एक साधक का दायित्व है की वह धर्म की पुनर्स्थापना
में अहर्निश लगा रहे | व्यक्ति समाज से अविभाज्य है फिर वह चाहे सन्यासी
ही क्यों नहीं हो | कंदराओ में बैठ कर भी हम समाज की मंगल कामना की
ही प्रार्थना करते है तो फिर अपने प्रत्यक्ष कर्मो से क्यों नहीं | सबसे महत्वपूर्ण बात, जन मानस की चेतना का पुनर्जागरण, उन्हें अधर्म एवं असत्य से लड़ने के लिए प्रेरित
करना तथा उसे अपने सामर्थ्य का भान करना ये कार्य एक परिव्राजक से बेहत्तर कौन कर
सकता है |(अपने आसन से उठ का गणेशदास के कंधो पर हाथ रखते
हुए ) कुमार ! एक बात और जान लो एक कमजोर को शक्ति का
भान करके, एक भीरु को निर्भीक बनाकर तथा असत्य की सत्ता
उखाड़ फेंकने से जो तुम्हारी अध्यात्मिक उन्नति होगी वह अतुलनीय है| पूर्ण निष्काम एवं निस्वार्थ भाव से किया गया एक
एक प्रयास समाज एवं व्यक्ति को उन्नति की और अग्रसर करेगा | (सम्पूर्ण सभा को मुखर
हो अपनी वज्र सी कठोर वाणी में )अतः तुम अपना स्वधर्म समझो और उसका पालन करो | जय श्री राम |
(इसी के साथ घोष हुआ )
जय जय रघुबीर समर्थ ||
दृश्य चार
(रायगढ़ के सभा प्रांगन में सभी सभासद अपने आसनों
पर बैठे है, सिंहासन पर छत्रपति एवं दाई ओर राजमाता जिजाबाई विराजित है, वैदिक
मंत्रोचार के साथ सभा शुरू होती है | )
कानोजी : (चिंता और उत्सुकता के समिश्रण से आई
उद्विग्नता के साथ ) शिवबा
इतनी शीघ्रता से सभा बुलाने का क्या हेतु है ? क्या स्वराज पर कोई बड़ा संकट आ गया
है ?
महाराज : मित्रो ! यह परीक्षा की घडी है, आज पुरे मराठा
में एक चेतना की लहर फ़ैल रही है | जन सामान्य की चेतना जागृत है, हमारी सामरिक
शक्ति बढ़ रही है | किन्तु... (एक दीर्घश्वास लेकर ) इधर मात खाया अरिदल भी पैतरे
बदल रहा है | हमे अपने विश्वस्ततम सूत्रों से पता चला है की आदिलशाही ओर बीजापुर
के नवाब ने हेदराबाद के निज़ाम के साथ मिल तिहरे आक्रमण की सुनियोजित योजना बनाई है
|
तानाजी : महाराज हमें हमारी रणनीति में कई बदलाव करने
पड़ेंगे, यह सूचना कब की है तथा इसकी संभावना कब है ?
महाराज : यह लगभग एक मास पहले की सूचना है तथा हमारे पास
लगभग दो मास का समय है | इस बार हम शत्रुओ से दो कदम आगे ही है |
(शिवाजी अपने आसन से उठते है ओर सभा के बिच में आ
जाते है, उत्साह ओर जोश के साथ ) कोण
बाबा ! आप ओर कानोजी गुरुदेव से संपर्क साधे, वे गाँव गाँव में स्वराज के रक्षार्थ
युवक तैयार कर रहे है, आप उनके सुनियोजन की व्यवस्था करे | तानाजी ओर विठोजी ! हम
चाहते है की आप मावलो को लेकर दक्षिण में सुरक्षा सुदृढ़ करे तथा निज़ाम की हर
गतिविधि पर नज़र रखे | (सभी सभा सद अपने आसन से उठ जाते है, शिवाजी म्यान से अपनी
विजयी तलवार निकलते है ) बांधवों ! एक बार फिर रणभेरी बज चुकी है, इस समय शत्रु
संगठित है किन्तु हमारी शक्ति भी पहले से दोगुनी है | साथ ही माता भवानी का
आशीर्वाद हम सब के ऊपर है | विजय का कोई विकल्प नहीं है, विजय अनिवार्य है |
हर हर महादेव !!!
(सम्पूर्ण सभागार में हुंकार उठी )
हर हर महादेव !! जय जय भवानी !! हर हर महादेव !!
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